अँधेरों को चीरती किरणें सूरज की;
अँधेरों के सदा रहने के वहम को तोड़ती हैं।
कामनी गुप्ता***
जम्मू!
कभी समुंद्र भी नहीं डुबो पाता हौंसले;
कभी साहिल से भी लहरों संग फिसल जाते हैं हम।
कामनी गुप्ता***
जम्मू!
भटका देते हैं शब्द कभी मंज़िल से और
फिर जाने क्या कहता है ये मौन।
कामनी गुप्ता***
जम्मू !
ख्बाबों और ख्वाहिशों का सिलसिला सा है;
पूरा होता तो है पर खत्म नहीं होता।
कामनी गुप्ता***
जम्मू!
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